भारतीय टेस्ट क्रिकेट का सुनहरा युग (2013-2026): पुजारा, कोहली और रहाणे की महान तिकड़ी की अनकही कहानी
भारतीय क्रिकेट इतिहास (Indian Cricket History) में कई ऐसे दौर आए हैं, जिन्होंने क्रिकेट फैंस के दिलों पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ी है। जब हम टेस्ट क्रिकेट की बात करते हैं, तो 90 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में ‘फैब 4’ (सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण और सौरव गांगुली) का दबदबा था। लेकिन जब इन दिग्गजों ने संन्यास लिया, तो हर किसी के मन में एक ही सवाल था – अब भारतीय टेस्ट क्रिकेट का मिडिल ऑर्डर कौन संभालेगा?
यहीं से शुरुआत होती है भारतीय टेस्ट इतिहास के एक नए और सबसे आक्रामक युग की—साल 2013 से लेकर 2026 तक का वह दशक, जिसने भारत को घर में अजेय बनाया और विदेशी सरजमीं (Overseas Conditions) पर जीतना सिखाया। यह युग तीन ऐसे स्तंभों पर टिका था, जिन्होंने नंबर 3, 4 और 5 की पोजीशन को अपनी जागीर बना लिया था। ये तीन नाम थे: चेतेश्वर पुजारा (Cheteshwar Pujara), विराट कोहली (Virat Kohli) और अजिंक्य रहाणे (Ajinkya Rahane)।
एक युग का निर्माण: जब टेस्ट क्रिकेट में शुरू हुआ भारत का दबदबा
2013 के आसपास जब राहुल द्रविड़ और सचिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ियों ने टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कहा, तब टीम इंडिया एक बड़े ट्रांजिशन (Transition Phase) से गुजर रही थी। उस समय टेस्ट मैचों में बल्लेबाजी क्रम (Batting Order) को एक नई स्थिरता की जरूरत थी। और यहीं से इन तीनों ने अपनी-अपनी भूमिकाएं तय कीं।
चेतेश्वर पुजारा ने नंबर 3 पर आकर राहुल द्रविड़ की तरह ‘दीवार’ बनने का काम किया, विराट कोहली ने नंबर 4 पर सचिन तेंदुलकर की विरासत को एक आक्रामक रूप में आगे बढ़ाया, और अजिंक्य रहाणे ने नंबर 5 पर लक्ष्मण की तरह संकटमोचक (Crisis Man) की भूमिका निभाई। इन तीनों का खेल एक-दूसरे से बिल्कुल अलग था, लेकिन जब ये तीनों एक साथ खेलते थे, तो विरोधी टीमों के पसीने छूट जाते थे।
आइए इन तीनों के व्यक्तिगत आंकड़ों और उनकी भूमिकाओं पर एक नजर डालते हैं:
1. चेतेश्वर पुजारा (नंबर 3) – टेस्ट क्रिकेट की ‘नई दीवार’
पुजारा ने इस स्वर्णिम दौर में 7195 रन बनाए। पुजारा आधुनिक युग (Modern Era) के उन चुनिंदा बल्लेबाजों में से थे जो टी20 क्रिकेट के शोर-शराबे से दूर, सिर्फ टेस्ट क्रिकेट की शुद्धता (Purity of Test Cricket) पर विश्वास करते थे।
खेलने का तरीका (Batting Style): पुजारा का काम रन बनाना ही नहीं था, बल्कि विरोधी टीम के तेज गेंदबाजों को थकाना था। वह घंटों तक क्रीज पर खड़े रहते थे।
सबसे बड़ा इम्पैक्ट: ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 2018-19 और 2020-21 की बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी (Border-Gavaskar Trophy) में पुजारा ने पैट कमिंस, मिचेल स्टार्क और जोश हेजलवुड जैसे खूंखार गेंदबाजों के बाउंसर अपने शरीर पर खाए, लेकिन अपना विकेट नहीं दिया। उनका यही जज्बा था जिसने भारत को ऑस्ट्रेलिया में लगातार दो ऐतिहासिक सीरीज जिताई। पुजारा के इस तरह गेंदबाजों को थकाने से बाद में आने वाले बल्लेबाजों (कोहली और रहाणे) को रन बनाने में आसानी होती थी।
2. विराट कोहली (नंबर 4) – आधुनिक युग के ‘रनमशीन’
इस दौर में विराट कोहली ने 9230 रन ठोके। वह इस तिकड़ी के सबसे आक्रामक और सफल बल्लेबाज थे।
खेलने का तरीका: कोहली ने भारतीय टेस्ट टीम में ‘निडरता’ (Fearlessness) का संचार किया। नंबर 4 पर आकर कवर ड्राइव्स और शानदार पुल शॉट्स से वह विरोधी टीम पर दबाव बना देते थे। उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में भी वनडे वाले इंटेंट के साथ बल्लेबाजी की।
सबसे बड़ा इम्पैक्ट: विराट कोहली सिर्फ एक बल्लेबाज नहीं थे, वह कप्तान भी थे। एडिलेड (2014) की दोनों पारियों में शतक हो या इंग्लैंड के खिलाफ 2018 में मुश्किल परिस्थितियों में बनाए गए रन, विराट ने साबित किया कि वह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ टेस्ट बल्लेबाज हैं। उनके नंबर 4 पर होने से विरोधी कप्तानों को अपनी फील्ड प्लेसमेंट हमेशा डिफेंसिव रखनी पड़ती थी।
3. अजिंक्य रहाणे (नंबर 5) – विदेशी पिचों के ‘संकटमोचक’
इस सुनहरे दौर में रहाणे ने 5077 रन बनाए। उनके आंकड़े शायद पुजारा या कोहली जितने विशाल न लगें, लेकिन रहाणे के रनों की अहमियत (Value of Runs) भारतीय टेस्ट इतिहास में सबसे ज्यादा रही है।
खेलने का तरीका: रहाणे की खासियत थी कि जब भी टॉप ऑर्डर फेल होता था, तब वह नंबर 5 पर आकर बेहतरीन काउंटर-अटैक करते थे। विदेशी पिचों पर जहाँ स्विंग और सीम होती थी, वहाँ रहाणे की तकनीक सबसे ज्यादा कारगर साबित होती थी।
सबसे बड़ा इम्पैक्ट: लॉर्ड्स (Lord’s 2014) की हरी पिच पर उनका शतक, और मेलबर्न (MCG 2020) में जब टीम इंडिया 36 रन पर आउट होने के बाद सदमे में थी, तब कप्तानी करते हुए उनका वह ऐतिहासिक शतक भारतीय क्रिकेट के सबसे महान पलों में से एक है। रहाणे वास्तव में विदेशी दौरों पर भारत के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज थे।
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क्यों इतनी सफल रही नंबर 3, 4 और 5 की यह तिकड़ी? (Unique Insights)
हमें यह समझना होगा कि सिर्फ रन बनाना ही इन तीनों को महान नहीं बनाता। इनकी महानता के पीछे एक बहुत बड़ी ‘रणनीतिक साझेदारी’ (Strategic Partnership) थी।
विरोधाभासी शैली (Contrasting Styles): पुजारा एक छोर से विकेट को बचाकर रखते थे, जिससे गेंदबाजों में फ्रस्ट्रेशन (निराशा) आती थी। वहीं कोहली और रहाणे दूसरी छोर से खराब गेंदों को बाउंड्री के पार भेजते थे। इससे स्ट्राइक रोटेट होती रहती थी और विरोधी टीम कभी हावी नहीं हो पाती थी।
विदेशी दौरों पर सफलता (Overseas Success Template): 2010 से पहले भारतीय टीम को ‘घर का शेर’ कहा जाता था। लेकिन इस तिकड़ी ने सेना (SENA – South Africa, England, New Zealand, Australia) देशों में जाकर जीत हासिल करना शुरू किया।
दबाव झेलने की क्षमता (Absorbing Pressure): कई बार जब भारत के सलामी बल्लेबाज (Openers) जल्दी आउट हो जाते थे, तब नंबर 3 पर पुजारा नई गेंद की चमक उतारते थे। इसके बाद नंबर 4 पर कोहली आकर पारी को तेजी से आगे बढ़ाते थे और अगर बीच में कोई कोलैप्स (Collapse) होता, तो नंबर 5 पर रहाणे आकर निचले क्रम (Lower Order) के बल्लेबाजों के साथ मिलकर सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाते थे।
एक युग का अंत: “विरासत जो हमेशा जिंदा रहेगी”
“All retired now, but the legacy they built together will live on forever.” आज के समय में भारतीय टेस्ट टीम का स्वरूप बदल चुका है। शुभमन गिल (Shubman Gill), यशस्वी जायसवाल (Yashasvi Jaiswal), और श्रेयस अय्यर (Shreyas Iyer) जैसे युवा अब इन स्थानों की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
चेतेश्वर पुजारा , विराट कोहली और अजिंक्य रहाणे अब टीम इंडिया के नियमित सदस्य नहीं हैं। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, हर महान युग का अंत होता है। लेकिन 2013 से 2026 के बीच इन तीनों ने भारतीय क्रिकेट को जो ऊंचाइयां दीं (खासकर पहली बार वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप WTC फाइनल तक का सफर), उसे क्रिकेट प्रेमी कभी नहीं भूल पाएंगे।
जब भी टेस्ट क्रिकेट के इतिहास की सबसे मजबूत तिकड़ियों (Most Dominant Test Trios) की बात की जाएगी, तो गॉर्डन ग्रीनिज-डेसमंड हेंस-विव रिचर्ड्स, और पोंटिंग-हेडन-गिल्क्रिस्ट के साथ-साथ पुजारा-कोहली-रहाणे का नाम हमेशा बड़े अक्षरों में लिखा जाएगा।
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टेस्ट क्रिकेट धैर्य, कौशल और मानसिक मजबूती का खेल है। चेतेश्वर पुजारा ने हमें धैर्य (Patience) सिखाया, विराट कोहली ने हमें जुनून (Passion) सिखाया और अजिंक्य रहाणे ने हमें शांत रहकर संकट से लड़ना (Perseverance) सिखाया।
इन तीनों के 21,000 से ज्यादा टेस्ट रन सिर्फ एक आंकड़ा नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय क्रिकेट के उस सुनहरे दशक की कहानी है जब टीम इंडिया ने दुनिया पर राज किया। आने वाली पीढ़ियां जब भी भारतीय टेस्ट क्रिकेट का इतिहास खंगालेंगी, तो 2013-2026 का यह दौर उन्हें हमेशा प्रेरित करेगा।





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